आरक्षण व्यवस्था भारतीय इतिहास के लिए कोई नई बात नहीं है। यदि देखा जाए तो इस देश में दो तरह की आरक्षण व्यवस्थाएं अस्तित्व में हैं। एक आरक्षण व्यवस्था तो वह है जो देश में संविधान लागू होने के साथ संविधान में इसका प्रावधान होने के कारण है जिसके बारे में प्राय: चर्चा होती रहती है, लेकिन एक आरक्षण व्यवस्था इस देश में आर्यों के आगमन के बाद इस देश में आर्यों की सत्ता स्थापित होने के बाद वर्णव्यवस्था के रूप में अस्तित्व में आयी। यह वर्णव्यवस्था जो कि आरक्षण व्यवस्था का ही दूसरा नाम थी, विदेशी आर्य शासकों की गहरी कुटिल सोच का परिणाम थी। आर्य जानते थे कि वे सामान्य तरीके से यहां के मूलनिवासियों पर शासन करने में सफल नहीं होगें। उन्हें लगातार अनेक शक्तिशाली मूलनिवासी शासकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा था, उनसे संघर्ष करना पड़ रहा था। इसलिए वे इस देश में ऐसी व्यवस्था लागू करना चाहते थे जिससे यहां के मूलनिवासी समाज का विरोध तो समाप्त हो ही, साथ ही लम्बे समय तक उन पर इस प्रकार शासन किया जा सके और भविष्य में कभी भी मूलनिवासयों के विरोध की सम्भावना न रहे। इसके लिए वर्णव्यवस्था का प्रारम्भ भारत में किया गया। आर्यों ने स्वयं को तीन वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को बांटा और समाज की सारी शक्तियों को अपने पास रखने के लिए उन्हें इन तीन वर्णों में बांट दिया। पढ़ना-पढ़ाना, दान लेना, यज्ञ कराना ब्राह्मण के लिए और रक्षा व शासन करने का अधिकार क्षत्रियों के लिए आरक्षित किया गया। इसी प्रकार व्यापार करने का अधिकार वैश्य को दिया गया। इस देश के मूलनिवासियों में से जो लोग आर्यों के सामने समर्पण कर चुके थे, उन्हें गुलाम अर्थात् शूद्र वर्ण में रखा गया और उनके लिए सेवा करने का कार्य आरक्षित किया गया। मूलनिवासियों के जिस वर्ग ने आर्यों के सम्मुख सरलता से समर्पण नहीं किया, आर्यों को लम्बे समय तक परेशान किया, ऐसे लोगों को वर्णव्यवस्था से बाहर रखकर गांव की सीमा पर रहने को कहा गया और गन्दे व घृणित कार्यों का आरक्षण इस वर्ग के लिए कर दिया गया। बाद में आर्यों ने मूलनिवासियों की एकता की सम्भावना को पूरी तरह समाप्त करने के लिए सारे मूलनिवासी समाज को कार्य के आधार पर अनेक जातियों में बांट के उनके बीच भेदभाव पैदा कर दिया।
आर्यों द्वारा लागू की गयी वर्णव्यवस्था रूपी आरक्षण व्यवस्था के प्रतियुत्तर में वर्तमान आरक्षण व्ययवस्था का प्रारम्भ हुआ है। आर्यों की जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था ने समाज में इतनी विषमता पैदा कर दी कि मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव की ऐसी दीवार बन गयी जिसे तोड़ना मनुष्य के हाथ में न रहा क्योंकि धर्म के ठेकेदारों ने इस आरक्षण व्यवस्था को ईश्वरीय अर्थात् ईश्वर द्वारा रचित घोषित कर दिया था। आर्यों की आरक्षाण व्यवस्था और वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में अन्तर यह है कि आर्यों की आरक्षण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को आरक्षण व्यवस्था को मानना पड़ता था क्योंकि आरक्षण व्यवस्था का उल्लघंन करने पर अर्थात् अपनी जाति के स्थान पर किसी दूसरी जाति के कार्य को करने पर कड़े दण्ड का प्रावधान था, लेकिन वर्तमान आरक्षण व्यवस्था कार्यों के ऊपर आधारित नहीं है। कोई भी व्यक्ति कोई सा भी कार्य करने के लिए स्वतंत्र है और इसलिए दण्ड का प्रश्न ही नहीं उठता। पुरानी आरक्षण व्यवस्था ने जहां इस देश के बहुसंख्यक मूलनिवासियों को गुलामी की जिन्दगी दी, यहां तक कि कुछ को तो पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को विवश किया और अल्पसंख्यक आर्यों को संसार के सारे सुख भोगने का अवसर प्रदान किया, वहीं वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में पुरानी आरक्षण व्यवस्था के कारण शोषण का शिकार रहे वर्ग को विकास की मुख्य धारा में लाकर समाज का समग्र विकास करने का प्रयास किया जा रहा है।
वास्तव में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था पुरानी आरक्षण व्यवस्था अर्थात् वर्णव्यवस्था के प्रभाव को समाप्त करने के लिए ही अस्तित्व में आयी है। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था वर्णव्यवस्था रूपी आरक्षण का इलाज है। जहर को जहर ही मारता है। यदि आर्यों ने जाति पर आधारित आरक्षण व्यवस्था इस देश में न लागू की होती तो वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की आवश्यकता नही न पड़ती।
वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का प्रारम्भ और विकास: वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का इतिहास कोल्हापुर के शासक शाहू जी महाराज के आदेश के साथ प्रारम्भ होता है। उन्होंने 26 जलाई, 1902 को एक आदेश के द्वारा अपनी रियासत में सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत पद
पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिए।[1] 1902 में राजा एडवर्ड तृतीय के राज्यभिषेक के अवसर पर शाहू जी महाराज को इंग्लैंड आने का निमंत्रण मिला। इंग्लैंड में प्रवास के दौरान उन्होंने वहीं से आदेश जारी किया कि राज्य में नौकरियों में 50 प्रतिशत पद तत्काल प्रभाव से पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित की जाएं। इन पिछड़ी जातियों में ब्राह्मण, प्रभु, सैन्वी, पारसी व अन्य अगड़ी जातियों को छोड़कर अन्य सभी जातियाँ शामिल थीं। उन्होंने इस आरक्षण के आदेश का ठीक से पालन न करने पर दण्ड का भी प्रावधान किया। भारतीय इतिहास में यह पहली ऐसी घटना थी जिसमें आर्यों की आरक्षण व्यवस्था के विपरीत जाकर इस देश के मूलनिवासियों को लाभ पहुँचाने वाली आरक्षण व्यवस्था देश के ही किसी भाग में लागू की गयी।
इसी समय दक्षिण में मद्रास प्रान्त में भी पश्चिमी शिक्षा के प्रसार ने वहां के गैर ब्राह्मणों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना आ रही थी। पूरे प्रान्त में सभी पदों पर ब्राह्मणों का कब्जा था। इस स्थिति के विरूद्ध गैर-ब्राह्मणों में रोष बढ़ता जा रहा था और कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन व आन्दोलन हो रहे थे। गैर-ब्राह्मण आन्दोलन के बढ़ने पर 1918 में मैसूर के महाराजा ने एक आयोग का गठन किया जो अपने तरह का पहला था।[2] इस आयोग को राज्य की नौकरियों में पिछड़ी जातियों के उचित प्रतिनिधित्व के लिए उपाय व सिफारिशें देने को कहा गया। 1921 में मद्रास सरकार ने राज्य की नौकरियों में गैर-ब्राह्मणों के लिए अधिकतम प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाया।[3] बाद में 1927 में इस व्यवस्था का विस्तार कर राज्य की समस्त जनता को पांच वर्गों में बांटकर प्रत्येक वर्ग के लिए पृथक कोटा निश्चित कर दिया गया।[4]
इसी प्रकार 1925 में बम्बई प्रान्त की सरकार ने एक प्रस्ताव पारित कर ब्राह्मण, प्रभु, मारवाड़ी, पारसी और बनिया को छोड़कर शेष सभी जातियों को पिछड़ा घोषित कर दिया जो किसी भी हालत में जनसंख्या के 90 प्रतिशत से कम न थी।[5] इन सभी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया। लेकिन पिछड़ी जातियों की पहचान को लेकर संशय की स्थिति बनी रही। अतः 1928 में बम्बई प्रान्त की सरकार ने पिछड़ी जातियों की पहचान और उनके विकास के लिए योजना बनाने हेतु एक समिति बनायी। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1930 में प्रस्तुत की जिसमें अस्पृश्य वर्ग, मूलनिवासी और पहाड़ी जातियाँ और अन्य पिछड़े वर्ग के लिए शिक्षा ओर सरकारी नौकरियों में नियुक्ति में विशेष सुविधाओं की अनुशंसा की गयी।[6]
यहाँ पर इस बात का उल्लेख करना अति-आवश्यक है कि पेरियार जी0वी0 स्वामी जो दक्षिण में गैर-ब्राह्मणों के आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे, को 1925 में तमिल कांग्रेस से इस बात पर त्याग पत्र देना पड़ा, क्योंकि ब्राह्मणों के बाहुल्य वाली तमिलनाडु कांग्रेस ने लोकसेवाओं में साम्प्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व देने वाले सिद्धान्त को नामंजूर कर दिया।[7] अपनी आखिरी सांस तक पेरियार ने आरक्षण नीति का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि जातिवाद ने लोगों को पीछे ढकेला है, जाति प्रथा ने हमें और नीचे गिराया है। अतः जब तक यह बुराई समाप्त नहीं हो जाती और जब तक सभी को जीवन में समान स्थान नहीं मिलता तब तक जनसंख्या के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त का परित्याग नहीं होना चाहिए। उन्होंने उच्च जातियों के श्रेष्ठता के दावे का जमकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि जब कोई पिछड़ी जाति का छात्र वही परीक्षा उत्तीर्ण करता है जो आप करते हैं तो आपकी अतिरिक्त श्रेष्ठता कैसी।[8]
डा॰ बी॰आर॰ अम्बेडकर का आरक्षण आन्दोलन में प्रवेश: भारतीय राजनीतिक एवं सामाजिक परिवेश में डा॰ अम्बेडकर का प्रवेश 1917 में हुआ और 1927 तक वे भारत के
अस्पृश्य कहलाने वाले समाज के एक छत्र नेता बन चुके थे। डा॰ अम्बेडकर ने राजनीतिक मुक्ति की तुलना में सामाजिक मुक्ति को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि बिना सामाजिक मुक्ति के राजनीतिक मुक्ति का कोई लाभ नहीं क्योंकि उस स्थिति में केवल शासक बदल जायेंगे लेकिन जाति व्यवस्था से पीड़ित लोगों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा। 1927 में जब भारत में शासन व्यवस्था की समीक्षा करने क लिए ब्रिटेन से साइमन आयोग भारत आया तो डा॰ अम्बेडकर को इस अस्पृश्य समाज की स्थिति पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया। यद्यपि हिन्दू नेताओं ने इसका विरोध किया लेकिन डा॰ अम्बेडकर ने मिले हुए अवसर का सदुपयोग किया और साइमन आयोग के सम्मुख अस्पृश्य समाज की शोचनीय स्थिति का बयान किया।
बाद में डा॰ अम्बेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग उसी आधार पर की, जिस आधार पर मुस्लिमों ने अपने लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की थी और जिसे कांग्रेस महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वीकार कर चुकी थी। लेकिन अस्पृश्यों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग को गांधी ने स्वीकार नहीं किया और डा॰ अम्बेडकर की इस मांग का सख्त विरोध किया। उनका महात्म्य दब गया और हृदय में हिन्दुत्व उभर आया। वे मुस्लिमों को तो सभी अधिकार देने को तैयार थे लेकिन अस्पृश्यों को नहीं। वे उन पर केवल दया करना चाहते थे। 1930-31 में हुए गोलमेज सम्मेलनों में डा॰ अम्बेडकर ने इस मांग को ब्रिटिश सरकार के सम्मुख पुरजोर तरीके से रखा। उन्होंने कहा कि भारत में एक ऐसा समुदाय भी है जो कहने को तो हिन्दू है लेकिन वास्तविकता में न तो हिन्दू है और न ही मुस्लिम। इसे अस्पृश्य कहा जाता है और पशुओं से भी बदतर व्यवहार इनके साथ ही किया जाता है। बाबा साहब ने कहा कि इस वर्ग को हिन्दुओं के रहमों करम पर नहीं छोड़ा जा सकता। अतः इस वर्ग के अधिकारों की सुरक्षा के लिए इसे भी मुस्लिम वर्ग की भांति पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के द्वारा अपने नेतृत्व को स्वयं चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। बाबा साहब अम्बेडकर के प्रयास रंग लाए और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने एक घोषणा के द्वारा अस्पृश्य वर्ग को भी पृथक निर्वाचन क्षेत्र की सुविधा देने की घोषणा कर दी।[9] लेकिन अस्पृश्य समाज को मिलने वाली खुशी कुछ क्षण की ही
थी। गांधी यह आरोप लगाकर कि सरकार का यह निर्णय हिन्दू समाज को बांटने वाला है, आमरण अनशन पर बैठ गए। गांधी के आमरण अनशन ने हिन्दुत्ववादी शक्तियों को मजबूत करने का काम किया। हिन्दुत्ववादी शक्तियां चाहे वह कांग्रेस के अन्दर हों या बाहर, पूरे देश में गांधी के नाम पर हिन्दुओं को अस्पृश्यों के विरोध में एकजुट करने लगी।
अन्त में वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था। गांधी जी का जीवन संकट में देख कर और पूरे देश में हिन्दुत्ववादी शक्तियों द्वारा अस्पृश्यों के विरूद्ध बनाये जा रहे वातावरण को देखकर डा॰ अम्बेडकर को झुकना पड़ा। इसके फलस्वरूप 1932 में सवर्ण हिन्दुओं के नेताओं और बाबा साहब अम्बेडकर के बीच पूना में समझौता हुआ जो पूना-पैक्ट के नाम से चर्चित हुआ।[10] इस समझौते में संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र और अस्पृश्यों के लिए आरक्षण का प्रावधान स्वीकार किया गया। पूना पैक्ट के बाद अस्पृश्य जातियों की पहचान कर उनकी एक अनुसूची बनायी गयी जिसके कारण यह अस्पृश्य वर्ग अनुसूचित जाति और इसी प्रकार आदिवासी वर्ग अनुसूचित जनजाति कहलाया। पूना पैक्ट के आधार पर विधायिका में 1935 के भारत सरकार अधिनियम से ही आरक्षण लागू हो गया और यही पूना पैक्ट संविधान बनते समय सरकारी नौकरियों में आरक्षण का आधार बना।
अन्य पिछड़े वर्ग (ओ.बी.सी.) के लिए आरक्षण में विलम्ब क्यों हुआ?
जैसा कि पिछले पृष्ठों में स्पष्ट किया गया है कि वर्णव्यवस्था में पीड़ित समाज अर्थात् मूलनिवासी बहुजन समाज के लिए आरक्षण की व्यवस्था चाहें 1902 में कोल्हापुर के शाहू महाराज ने की हो या चाहें मैसूर के राजा ने, या चाहे मद्रास या बम्बई प्रान्त की सरकारों द्वारा इस सम्बन्ध में कदम उठाये गए हों, लेकिन भारतीय संविधान में जब आरक्षण व्यवस्था का प्रावधान किया गया तो प्रारम्भ में यह व्यवस्था केवल अनुसूचित जाति और अनसूचित जनजातियों के लिए ही की गयी। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी.) को यह अधिकार पाने के लिए 1990 के दशक तक एक लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ी।
ऐसा क्यों हुआ?
अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था के लागू होने में विलम्ब के लिए संविधान सभा के वो सदस्य उत्तरदायी है जो उच्चजातीय मानसिकता से ग्रस्त थे और हिन्दू धर्म की भेदभाव वाली व्यवस्था बनाये रखना चाहते थे। पूना-पैक्ट के कारण और डा॰ बी॰आर॰ अम्बेडकर के प्रभाव के कारण वे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का विरोध करने की स्थिति में नहीं थे। इस समय अन्य पिछड़े वर्ग का कोई ऐसा सशक्त नेता भी नहीं था जो उनके अधिकारों के लिए लड़ता। ऐसी स्थिति में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की बात भी संविधान सभा में डा॰ बी॰आर॰ अम्बेडकर ने ही उठायी। बाबा साहब का सपना भारत में समतामूलक समाज का निर्माण करना था। यह तभी सम्भव था जब अन्य पिछड़े वर्ग को भी विकास की दौड़ में भागीदारी करने का अवसर मिलता। लेकिन अन्य पिछड़े वर्ग के मुद्दे पर बाबा साहब अम्बेडकर को अन्य किसी ताकतवर नेता का सहयोग नहीं मिला। आरक्षण विरोधियों ने अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान का प्रश्न खड़ा कर दिया। पूना पैक्ट के बाद अस्पृश्य और जनजातियों की पहचान हो चुकी थी और उन्हें अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में दो अनुसूचियों में सूचीबद्ध किया जा चुका था, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों की ऐसी पहचान का कोई कार्य नहीं हुआ था। यदि संविधान सभा के सभी सदस्य सहमत होते तो यह कार्य शीघ्र किया जा सकता था लेकिन अधिकांश सदस्यों की जातीय मानसिकता इसके आड़े आ रही थी। वे आरक्षण व्यवस्था के विस्तार के विरूद थे। लेकिन फिर भी बाबा साहब अम्बेडकर के प्रयासों से अन्त में इस बात पर सहमति हुई कि अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों की पहचान के लिए एक आयोग बनाने की व्यवस्था की जाए। यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 में की गयी।
कालेलकर आयोग: देश की स्वतन्त्रता के बाद और भारतीय संविधान के लागू हो जाने के बाद भी अनुच्छेद 340 के अन्तर्गत कोई कार्यवाही नहीं की गयी। बहरहाल डा॰ अम्बेडकर जैसे कुछ लोगों के दबाव के कारण 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में अनुच्छेद 340 के तहत एक आयोग अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों की पहचान के लिए बनाया गया। काका कालेलकर ने अपनी रिपोर्ट 1955 में सरकार को सौंपी। लेकिन रिपोर्ट तैयार करते समय वर्णवादी
व्यवस्था के समर्थकों ने काका कालेलकर की उच्च जातीय मानसिकता को उभारा और उनसे रिपोर्ट में ऐसी बातें डालने को कहा जिससे रिपोर्ट स्वीकार ही न हो। परिणाम यह हुआ कि वैसे तो काका कालेलकर ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 70 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की, जिसमें उन्होंने स्त्रियों (सभी जातियों की) को भी शामिल किया, लेकिन जानबूझकर रिपोर्ट में आरक्षण व्यवस्था के विरोध में निम्नलिखित तर्क भी दे डाले-
(1) पिछड़ी जातियां यदि पिछड़ी रही तो इसमें दोष इन जातियों का ही है क्योंकि इन्होने शिक्षा के महत्व को नहीं समझा और अतीत में मूर्खतावश शिक्षा की उपेक्षा की। अतः अब उनका सरकारी नौकरियों आदि में विशेष सुविधाओं की मांग करना गलत है।
(2) सरकारी नौकरियों में आरक्षण गलत है क्योंकि सरकारी नौकरियां नौकरी के लिए नहीं, समाज-सेवा के लिए होती हैं। यदि पिछड़ी जातियां प्रशासन की दया-दृष्टि पर ही भरोसा रखें तो उन्हें अधिक लाभ हो सकता है।
(3) जाति के आधार पर पिछड़ेपन की शिनाख्त करने से जाति-व्यवस्था स्थायी तौर से बनी रहेगी और सुविधाएं उन जातियों के कुछ लोगों को ही मिलेगी, असली जरूरतमन्दों तक सुविधाएं नहीं पहुंचेगी।[11]
जहा तक पहले तर्क का सम्बन्ध है, कालेलकर यह भली भांति जानते थे कि इन जातियों को उनके पूवजों ने ही धर्मशास्त्रों का सहारा लेकर शिक्षा के अधिकार से वंचित किया था। ब्राह्मण जाति के एक विद्वान माने जाने वाले कालेलकर यह भूल गये थे कि मनुस्मृति और याज्ञवलक्य स्मृति में शूद्र को ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करने पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया था, यहां तक कि वेद सुनने पर उनके कानों में पिघले शीशे को डालने का आदेश दिया गया था। स्पष्ट है कि ये सब बातें कालेलकर को अच्छी तरह मालूम थीं और यह मूर्खतापूर्ण तर्क देकर तो उन्होंने अपने सनातन हिन्दू धर्म को बचाने का प्रयास किया था।
आरक्षण के विरोध में कालेलकर का दूसरा तर्क यदि स्वीकार कर लिया जाए तो इसका अर्थ होगा कि 15 प्रतिशत तथाकथित उच्च जातियां देश के शासन-प्रशासन में कब्जा कर राज करती रहें क्योंकि यह उनके लिए समाज सेवा का कार्य होगा और 85 प्रतिशत जनसंख्या वाला मूलनिवासी बहुजन समाज उनकी दया पर जीवन बिताए। अर्थात् जिस प्रकार हिन्दू धर्म के आदेशानुसार अल्पसंख्यक आर्य जातियां पिछले चार हजार वर्षों से शासक बनी हुई हैं, वे भविष्य में भी शासक की ही भूमिका निभाती रहें और बहुसंख्यक शूद्र-अतिशूद्र जातियां पहले की तरह ही उनकी गुलामी करती रहें।
कालेलकर के तीसरे तर्क अर्थात् पिछड़ेपन की शिनाख्त करने वाले तर्क को आज तक आरक्षण विरोधी आरक्षण के विरोध में उठाते रहे हैं। जाति भारतीय समाज की सच्चाई है और आज भी समाज में जातिगत भेदभाव बना हुआ है। इस बात को सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन्द्रा साहनी[12] समेत अनेक मामलों में स्वीकार किया है और इसके साथ ही इन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़ेपन की पहचान के लिए जाति को ही एक मात्र आधार स्वीकार किया है।
वास्तव में इन घटिया तर्कों के पीछे कालेलकर का एक मात्र उद्देश्य केवल यह था कि किसी प्रकार उनकी रिपोर्ट नामंजूर कर दी जाए और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का ममला ठन्डे बस्ते में चला जाए। बहरहाल वर्णव्यवस्था के समर्थकों के प्रभावस्वरूप कालेलकर ने जो चाल चली थी वह सफल हुई और प्रधानमंत्री नेहरू के नेतृत्व में तत्कालीन केन्द्रीय सरकार ने इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। बाद में समय-समय पर इस रिपोर्ट को लागू करने की मांग उठती रही, लेकिन उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
मंडल आयोग: 1977 में हुए लोक सभा चुनाव में मोरार जी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकारी आयी। जनता पार्टी के चुनाव के समय कालेलकर रिपोर्ट को लागू करने का वायदा किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद इस मुद्दे को फिर दरकिनार कर दिया गया। बाद में दबाव पड़ने पर 20 दिसम्बर, 1978 को तत्कालीन सरकार ने कालेलकर रिपोर्ट को पुरानी कहकर
अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों की पहचान के लिए बी॰पी॰मण्डल की अध्यक्षता में एक नये आयोग की रचना कर दी।
मंडल आयोग के विचारार्थ निम्नलिखित विषय थे:-
1, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को परिभाषित करने के लिए मानदंड निर्धारित करना।
2, नागरिकों के सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए उठाए जाने वाले कदमों की सिफारिश करना।
3, ऐसी पिछड़े वर्गों के नागरिकों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए प्रावधान करने की वांछनीयता या अन्यथा जांच करना जिनका केंद्र और राज्य सरकारों/ केंद्र शासित प्रदेश/ प्रशासन की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है; और पाये गए तथ्यों के आधार पर उचित अनुशंसाओं के साथ एक रिपोर्ट सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करना।
अपने अध्ययन के दौरान आयोग ने पाया कि जाति भी एक वर्ग ही है और यदि कोई जाति सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी पाई जाती है, तो पूरी जाति के लिए आरक्षण की अनुमति दी जा सकती है। मंडल आयोग के सामने पिछड़े वर्ग के संबंध में अपने अध्ययन के दौरान एक समस्या अन्य पिछड़े वर्ग की वास्तविक जनसंख्या को लेकर आई। चूंकि 1931 की जनगणना के बाद देश में कोई भी जाति आधारित जनगणना नहीं कराई गई थी इसलिए 1931 की जनगणना के आंकड़ों के अतिरिक्त अन्य पिछड़े वर्ग के बारे में उसकी कुल जनसंख्या को लेकर कोई निश्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं था। इसलिए मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1931 की जाति आधारित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही तैयार की। आयोह के सम्मुख एक समस्या और थी। 1931 की जनगणना के आधार अन्य पिछड़े वर्ग की जनसंख्या 52 प्रतिशत मनी गयी थी लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने एम.आर. बाला जी बनाम मैसूर राज्य [13] में दिये गए अपने निर्णय में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत निश्चित कर दी थी और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का कुल आरक्षण 22.5% पहले से था। इसलिए मंडल आयोग ने
दोनों बातों को ध्यान में रखते हुये अन्य पिछड़े वर्ग के लिए सरकारी सेवाओं में 27% आरक्षण की अनुशंसा की।
यद्यपि आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट दे दी लेकिन एक बार फिर उसे ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया। बहरहाल 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा की, लेकिन सरकार के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती मिलने के कारण अन्य पिछडे़ वर्ग को 1992 तक प्रतीक्षा करनी पड़ी जब 1992 में इन्दिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले[14] में सर्वोच्च न्यायालय ने मण्डल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर अन्य पिछड़े वर्ग के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण व्यवस्था को वैधानिक घोषित किया। यहाँ पर इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि यद्यपि मण्डल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 1992 में केन्द्रीय सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था प्रारम्भ हुई लेकिन कई राज्यों में राज्य स्तर पर अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था 70 के दशक में ही प्रारम्भ हो गयी थीं जैसे उत्तर प्रदेश में 1977 में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए राज्य स्तर की नौकरियों में और राजकीय शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण प्रारम्भ हो गया[15] था।
मंडल आयोग की रिपोर्ट का प्रभाव: मंडल आयोग ने नौकरियों में आरक्षण की सिफारिश में यह लिखा था, “हमारा यह तर्क नहीं है कि अन्य पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों को कुछ हजार नौकरियां देकर हम देश की कुल आबादी के 52 प्रतिशत पिछड़े वर्ग को अगड़ा बनाने में सक्षम होंगे। लेकिन हम यह निश्चित रूप से मानते हैं कि यह सामाजिक पिछड़ेपन के खिलाफ लड़ाई का जरूरी हिस्सा है, जो पिछड़े लोगों के दिमाग में लड़ा जायेगा। भारत में सरकारी नौकरी को हमेशा से प्रतिष्ठा और ताकत का पैमाना माना जाता रहा है। सरकारी सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर हम उन्हें देश के प्रशासन में हिस्सेदारी की तत्काल अनुभूति देंगे। जब एक पिछड़े वर्ग का अभ्यर्थी कलेक्टर या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक होता है तो उसके पद से भौतिक लाभ उसके परिवार के सदस्यों तक सीमित होता है। लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर बहुत व्यापक होता है। पूरे पिछड़े वर्ग समाज को लगता है कि उसका सामाजिक स्तर ऊपर उठा
है। भले ही पूरे समुदाय को ठोस या वास्तविक लाभ नहीं मिलता है, लेकिन उसे यह अनुभव होता है उसका “अपना आदमी” अब “सत्ता के गलियारे” में पहुंच गया है। यह उसके हौसले और मानसिक शक्ति को बढ़ाने का काम करता है।”[16]
निस्संदेह मंडल आयोग की उपरोक्त बात अक्षरश: सत्य साबित हुई। जब हजारों की संख्या में अन्य पिछड़े वर्ग के लोग प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होने लगे तो उसका प्रभाव पूरे पिछड़े समाज पर पड़ा। अन्य पिछड़े वर्ग के युवाओ के अंदर यह भावना मजबूत हुई कि वे भी उच्चप्रशासनिक पदों पर पहुंच सकते हैं। लेकिन मंडल आयोग की रिपोर्ट का प्रभाव केवल युवाओं में सरकारी नौकरियों और खासतौर से प्रशासनिक पदों को प्राप्त करने की ललक पैदा करने तक ही सीमित नहीं रहा। मंडल आयोग की सिफारिश के आधार पर नौकरियों में आरक्षण का प्रभाव नौकरियों के दायरे से बाहर जाकर बहुत ही व्यापक रूप वाला सिद्ध हुआ। इसका एक बड़ा कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी नौकरी में आरक्षण के प्रावधान का सवर्ण जातियों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध भी रहा। यहां यह बताना उचित होगा कि विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा मंडल आयोग की रिपोर्ट की मात्र एक सिफारिश, जो सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण से संबन्धित, को लागू करने का आदेश जारी किया गया था। लेकिन इस आदेश से ही पूरे देश में भूचाल सा आ गया। जगह-जगह धरने प्रदर्शन हुए। अन्य पिछड़ा वर्ग लिए आरक्षण के प्रावधान करने वाले सरकारी आदेश के संबंध में अन्य पिछड़े वर्ग को भी गुमराह किया गया और उनके बीच यह अफवाह फैला दी गई कि अनुसूचित जाति का आरक्षण और बढ़ा दिया गया है, जिससे अन्य पिछड़े वर्ग के युवा भी मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर नए आरक्षण के विरोध में धरने प्रदर्शन में शामिल हुए। यही कारण है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के विरोध में धरना-प्रदर्शन में राजीव गोस्वामी नाम के जिस युवक ने आत्मदाह करने का प्रयास किया वह भी अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित था। उसे पता ही नहीं था कि वह आरक्षण के सम्बंध में जिस सरकारी आदेश के विरोध में अपनी जान देने का प्रयास कर रहा था वह उसके ही वर्ग के लोगों के उत्थान से सम्बंधित था।
अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण के सरकारी आदेश का सवर्ण जातियों द्वारा विरोध करने ने अन्य पिछड़े वर्ग पर एक दूसरे प्रकार का लेकिन अधिक महत्वपूर्ण और सकारात्मक प्रभाव डाला। सवर्ण जातियों के इस विरोध ने अन्य पिछड़े वर्ग की सोच को बदल दिया। उसे दोस्त और दुश्मन को पहचानने में मदद की। आरक्षण के मुद्दे पर सदैव अनुसूचित जाति/जनजाति का विरोध करने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति/जनजाति के बीच की दूरी केवल आरक्षण के मुद्दे पर ही कम नहीं हुई बल्कि सामाजिक न्याय के संघर्ष में अन्य मुद्दों पर भी बहुत ही शीघ्र दोनों वर्गों के लोग आपस में हाथ मिलाने लगे। दरअसल अन्य पिछड़ा वर्ग के अंदर अपने अधिकारों के प्रति चेतना का निर्माण जिस तेजी से अब हुआ वैसा पहले कभी नहीं हुआ था।
अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण के बाद बदली हुई सामाजिक परिस्थितियों ने देश की राजनीति को भी प्रभावित किया। नयी परिस्थितियों में देश में और खासतौर से उत्तर भारत में अन्य पिछड़े वर्ग में राजनीतिक चेतना का निर्माण भी बहुत तेजी से हुआ। इस राजनीतिक चेतना ने अन्य पिछड़े वर्ग के नेताओं में सत्ता पर अधिकार करने की महत्वाकांक्षा पैदा की, उनके अंदर अपनी राजनीतिक तकदीर खुद लिखने का जज्बा पैदा किया। 1980 के बाद उत्तर भारत में लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार जैसे पिछड़ी जातियों के तमाम नेताओं का राजनीतिक दबदबा इसी पृष्ठभूमि से उत्पन्न हुआ। इसी कारण इसे भारतीय राजनीति की मूक क्रांति या साइलेंट रिवॉल्यूशन कहा जाता है।
मंडल आयोग की सभी सिफ़ारिशें लागू क्यों नहीं?
मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय 13 में कुल 40 पॉइंट में अन्य पिछड़े वर्ग के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से अनेक महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं। लेकिन देश की 52 प्रतिशत जनसंख्या वाले अन्य पिछड़ा वर्ग का दुर्भाग्य देखिए कि सत्ता में बैठे हुए लोगों ने जब मजबूरी में इस रिपोर्ट को लागू करने का निर्णय भी लिया तो केवल एक सिफारिश लागू की जो सरकारी नौकरियों में आरक्षण के संबंध में थी। दूसरी सिफारिश शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण के संबंध में 2006 में लागू हुई जब तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने उच्च शिक्षण संस्थानों में
अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण के संबंध में आदेश पारित किया और इस संबंध में 93वां संविधान संशोधन विधेयक संसद में पारित किया गया। इस अवसर पर भी सवर्ण जातियों ने अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण का खुलकर विरोध किया। आरक्षण विरोधी सड़क पर ही नहीं उतरे बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट सहित अनेक हॉस्पिटल कई दिनों तक बंद करवा दिए। बहरहाल आरक्षण का यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा और 2008 में अशोक कुमार ठाकुर बनाम केंद्र सरकार[17] के मामले में उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण से संबंधित 93वे संविधान संशोधन कानून को सही ठहराया। ॰
नौकरियों में आरक्षण और बाद में शिक्षण संस्थानों में आरक्षण को छोड़कर पिछड़े वर्ग के संबंध में मंडल आयोग की किसी भी अनुशंसा अर्थात सिफ़ारिश पर किसी भी सरकार ने आज
तक विचार नहीं किया। न तो केंद्र में बैठी किसी सरकार की नीयत अन्य पिछड़ा वर्ग के हित में रही और न ही अन्य पिछड़े वर्ग के नेता या सामाजिक संगठनों ने मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू करवाने के लिए कोई आवाज सशक्त ढंग से उठायी। ॰
मंडल आयोग की मुख्य अनुशंसाएं: आयोग ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय 13 में जो अनुशंसाएं/सिफारिशें की हैं उनमें कई बहुत ही महत्वपूर्ण है और यदि आज भी उन पर सरकार ठोस निर्णय ले तो देश की इस 52% जनसंख्या वाले वर्ग की किस्मत बदल सकती है। (मंडल आयोग की रिपोर्ट के अध्याय 13 में 40 पॉइंट् में उल्लिखित सभी सिफ़ारिशें अपनी मूल भाषा में परिशिष्ट के रूप में पुस्तक के अंत में हैं)
आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशें[18] जिनपर वर्तमान समय में ध्यान देना अतिआवश्यक है, बिंदुवार इस प्रकार हैं: –
1, मंडल आयोग की पहली सिफारिश ही बहुत महत्वपूर्ण है जिसमें उसने यह माना है कि अन्य पिछड़े वर्ग का सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ापन और गरीबी जाति आधारित बाधाओं के कारण हैं। चूंकि यह जाति आधारित बाधाएं हमारे सामाजिक ढांचे से जुड़ी हुई है इसलिए इन्हें समाप्त करने के लिए ढांचागत बदलाव की आवश्यकता है। आयोग ने कहा कि अन्य पिछड़े वर्ग
की समस्याओं के संदर्भ में देश के शासक वर्ग के लिए समाज के इस ढांचे में बदलाव लाना आवश्यक और महत्वपूर्ण है।
2, खुली प्रतिस्पर्धा में मेरिट के आधार पर अन्य पिछड़े वर्ग के जो अभ्यर्थी चुने जाएं उन्हें उनके लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में समायोजित न किया जाए।
3, पदोन्नति में प्रत्येक स्तर पर 27 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाए।
4, अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए बनाई गयी रोस्टर प्रणाली की तरह अन्य पिछड़े वर्ग के लिए भी रोस्टर प्रणाली तैयार की जाए।
5, सरकार से किसी भी तरह की वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाले निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को भी अपने यहाँ कर्मचारियों की भर्ती में अन्य पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए 27% आरक्षण की व्यवस्था करने को बाध्य किया जाए।
6, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए आयोग ने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप आभिजात्य वर्ग के हितों वाला है। अत: इसे बदलने कि आवश्यकता है ताकि यह पिछड़े वर्ग की जरूरतों के अनुरूप बन सके।
7, अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए अलग से धन की व्यवस्था सरकार करे।
8, आयोग ने प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता पर ध्यान दिलाते हुये कहा कि अन्य पिछड़े वर्ग के बच्चे स्कूल जल्दी छोड़ देते हैं। इसलिए सरकार अन्य पिछड़े वर्ग की घनी आबादी वाले क्षेत्रों में प्रौढ़ शिक्षा के स्कूल स्थापित करे।
9, आयोग ने पिछड़ेवर्ग की घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इस वर्ग के लिए आवासीय विद्यालय खोलने की भी अनुशंसा की और कहा कि इन विद्यालयों में रहने खाने की सभी सुविधाए निशुल्क हों ताकि पिछड़े वर्ग के गरीब बच्चों को शिक्षा की ओर आकर्षित किया जा सके।
10, अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए सरकार हॉस्टल की सुविधा प्रदान करे जिसमें रहने और खाने की सुविधा निशुल्क हो।
11, आयोग ने कहा कि अन्य पिछड़े वर्ग का बहुत छोटा हिस्सा ही सरकारी नौकरी में जा सकता है, इसलिए इस वर्ग के छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा दिलाने पर सरकार विशेष ध्यान दे।
12, आयोग ने कहा कि अन्य पिछड़े वर्ग के छात्र आरक्षण से तकनीकी और व्यावसायिक कालेजों में प्रवेश तो पा जाएंगे लेकिन अपनी साधनहीन पृष्ठभूमि के कारण यह संभव है कि वे अन्य सामान्य छात्रों से बराबरी न कर सकें। इसलिए ऐसे छात्रों के लिए सरकार निशुल्क कोचिंग की व्यवस्था करे। आयोग ने कहा कि तकनीकी संस्थानों में प्रवेश मिलना ही इन छात्रों के लिए पर्याप्त नहीं है। प्रवेश के बाद उन्हें विशेष कोचिंग जैसी सुविधाओं का मिलना भी आवश्यक है वरना ये छात्र अध्ययन के दौरान निराशा और अपमान महसूस करेंगे।
13, पिछड़े वर्ग में स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोग ने कहा कि गाँव में बर्तन बनाने वाले, तेल निकालने वाले, लोहार और बढ़ई जैसे वर्गों सरकार उचित वित्तीय व तकनीकी सहायता और व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराये।
14, इस तरह की सुविधा पिछड़े वर्ग के उन अभ्यर्थियों को भी उपलब्ध कराई जाए जिन्होंने विशेष व्यावसायिक प्रशिक्षण लिया है।
15, राज्य द्वारा संचालित वित्तीय और तकनीकी संस्थाओं का लाभ प्राय: समाज के शक्तिशाली लोग उठा लेते हैं इसलिए स्वरोजगार का प्रयास करने वाले पिछड़े वर्ग के लोगों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देने के लिए पृथक वित्तीय और तकनीकी संस्थाएं स्थापित कि जाए।
16, स्वरोजगार में लगे पिछड़े वर्ग के लोगों की सहायता व्यावसायिक समूहों की सहकारी समितियां भी कर सकती हैं लेकिन इन सहकारी समितियों के पदाधिकारी पिछड़े वर्ग के लोगों का शोषण न कर सकें, इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए।
17, देश के औद्योगिक और व्यावसायिक जीवन में अन्य पिछड़े वर्ग की भागीदारी न के बराबर है। इसलिए वित्तीय और तकनीकी संस्थाओं का पृथक नेटवर्क इस प्रकार तैयार किया जाए कि उससे पिछड़े वर्ग की औद्योगिक व व्यावसायिक इकाइयों का विकास तेज गति से हो सके।
18, सभी राज्य सरकारों को प्रगतिशील भूमि सुधार कानून लागू करना चाहिए, जिससे देशभर के मौजूदा उत्पादन संबंधों में ढांचागत एवं प्रभावी बदलाव लाया जा सके।
19, जिस प्रकार अनुसूचित जाति/जनजाति के गरीब व्यक्तियों को गाँव में अतिरिक्त भूमि का आवंटन किया जाता है, उसी प्रकार से पिछड़े वर्ग के गरीब व्यक्तियों को भी गाँव में अतिरिक्त भूमि आवंटित की जाए।
20, सरकार मण्डल आयोग की इन अनुशंसाओं को लागू करने के लिए उचित वैधानिक प्रावधान करे।
पिछड़े वर्ग को मंडल आयोग की उपरोक्त अनुशंसाओं को लागू करवाने के लिए संघर्ष करना चाहिए। साथ ही पिछड़े वर्ग को अपनी जनसंख्या के अनुसार आरक्षण की मांग करनी चाहिए। आरक्षण के संबंध में 50 प्रतिशत की जिस सीमा का ध्यान मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में रखा था उसका महत्व गरीब सवर्ण के लिए 10% आरक्षण के प्रावधान से समाप्त हो गया है क्योंकि गरीब सवर्ण के इस आरक्षण के साथ कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा पर कर चुका है। वैसे भी संविधान में आरक्षण के संबंध में अधिकतम सीमा का कोई प्रावधान नहीं है, यह केवल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण था। देश की 52 प्रतिशत जनसंख्या वाले अन्य पिछड़े वर्ग के लिए मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान अन्यायपूर्ण है।
